ग्वालियर हाई कोर्ट ने मानव तस्करी के आरोप में गिरफ्तार आरोपी को दी जमानत, पीड़िता के hostile होने को माना महत्वपूर्ण आधार
ग्वालियर हाई कोर्ट ने मानव तस्करी के आरोप में गिरफ्तार आरोपी को दी जमानत, पीड़िता के hostile होने को माना महत्वपूर्ण आधार
15 दिसंबर 2025 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ ने Bhagchandra Aadiwasi बनाम मध्य प्रदेश राज्य (Neutral Citation: 2025:MPHC-GWL:33000, MCRC No. 55306/2025) में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए आरोपी को जमानत प्रदान की। यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फडके द्वारा पारित किया गया। इस आवेदन में आरोपी की ओर से अधिवक्ता अभिषेक जाट उपस्थित हुए, जबकि राज्य की ओर से लोक अभियोजक श्री समर घुरैया ने जमानत का विरोध किया।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, थाना कोतवाली, जिला अशोकनगर में अपराध क्रमांक 326/2025 पंजीबद्ध किया गया था, जिसमें यह आरोप लगाया गया कि आरोपी ने सह-आरोपियों के साथ मिलीभगत कर पीड़िता को राजस्थान के गेहूं खेड़ी क्षेत्र में ले जाकर ₹1,30,000 की राशि में बेच दिया। इस आधार पर आरोपी के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 143(2) के अंतर्गत अपराध दर्ज किया गया। आरोपी को 2 अगस्त 2025 को गिरफ्तार किया गया था और तब से वह न्यायिक हिरासत में था।
जमानत याचिका में आवेदक की ओर से यह दलील दी गई कि आरोपी निर्दोष है और उसे झूठे आरोपों में फँसाया गया है। विशेष रूप से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि पीड़िता का न्यायालयीन बयान 4 दिसंबर 2025 को दर्ज किया गया, जिसमें उसने अभियोजन के कथन का समर्थन नहीं किया और hostile हो गई। आवेदक की ओर से यह भी कहा गया कि पीड़िता का hostile होना अभियोजन के मामले को गंभीर रूप से कमजोर करता है और आरोपों की साक्ष्यात्मक शक्ति को कम करता है। इसके अतिरिक्त, यह तर्क रखा गया कि ट्रायल के शीघ्र समाप्त होने की संभावना नहीं है और ऐसी स्थिति में आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखना प्री-ट्रायल सज़ा के समान होगा।
इसके विपरीत, राज्य तथा शिकायतकर्ता की ओर से जमानत आवेदन का कड़ा विरोध किया गया। हालांकि, न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों, केस डायरी तथा रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद यह पाया कि पीड़िता का न्यायालय में hostile होना, आरोपों की प्रकृति और ट्रायल में संभावित विलंब ऐसे महत्वपूर्ण कारक हैं, जिन पर जमानत पर विचार किया जाना आवश्यक है। न्यायालय ने विशेष रूप से यह टिप्पणी की कि लंबी प्री-ट्रायल हिरासत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अवधारणा के विपरीत है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित है।
न्यायालय का यह दृष्टिकोण सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुरूप है, जैसे Sanjay Chandra बनाम CBI (2012), जिसमें कहा गया कि जमानत का उद्देश्य अभियुक्त को सज़ा से पूर्व दंड देना नहीं है, तथा Dataram Singh बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2018), जिसमें यह दोहराया गया कि जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, अभियुक्त को निर्दोष माना जाना न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है।
इन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, उच्च न्यायालय ने आरोपी को ₹50,000 के निजी मुचलके एवं समान राशि के एक सक्षम जमानतदार पर रिहा करने का निर्देश दिया। साथ ही, आरोपी पर यह शर्तें लगाई गईं कि वह ट्रायल में सहयोग करेगा, किसी गवाह को प्रभावित नहीं करेगा, कोई अन्य अपराध नहीं करेगा, अनावश्यक स्थगन नहीं माँगेगा तथा न्यायालय की अनुमति के बिना देश से बाहर नहीं जाएगा। यह भी स्पष्ट किया गया कि शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में जमानत स्वतः निरस्त मानी जाएगी।
इस आदेश से यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि BNSS के लागू होने के बाद भी न्यायालयों का दृष्टिकोण स्थिर है—व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और जब अभियोजन का मामला प्रथम दृष्टया कमजोर प्रतीत होता है, तब अभियुक्त को अनावश्यक रूप से लंबे समय तक हिरासत में रखना न्यायसंगत नहीं है। ग्वालियर हाई कोर्ट का यह निर्णय जमानत न्यायशास्त्र में साक्ष्य के मूल्यांकन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संतुलन का एक और महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है।
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