ग्वालियर हाई कोर्ट ने चोरी के आरोपित को दी जमानत, लंबी न्यायिक हिरासत को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया
ग्वालियर हाई कोर्ट ने चोरी के आरोपित को दी जमानत, लंबी न्यायिक हिरासत को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया
लेखक: Advocate Abhishek Jat
29 अक्टूबर 2025 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ ने Saddam @ Raja बनाम मध्य प्रदेश राज्य (Neutral Citation: 2025:MPHC-GWL:27221, MCRC No. 48862/2025) में एक महत्त्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए चोरी के मामले में गिरफ्तार आरोपी को जमानत प्रदान की। यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फडके द्वारा पारित किया गया। इस आवेदन में आरोपी की ओर से अधिवक्ता विभोर कुमार साहू उपस्थित हुए, जबकि राज्य की ओर से लोक अभियोजक श्री अनुराग शर्मा ने विरोध प्रस्तुत किया।
इस प्रकरण की पृष्ठभूमि के अनुसार, थाना कोतवाली जिला गुना में अपराध क्रमांक 992/2023 पंजीबद्ध किया गया था, जिसमें शिकायतकर्ता ने यह आरोप लगाया था कि 21 नवंबर 2023 को उनकी होंडा मोटरसाइकिल दोपहर लगभग 2 बजे शहर के कनहैयालाल कोठी क्षेत्र से चोरी हो गई थी। पुलिस ने बाद में आरोप लगाया कि आरोपी सद्दाम और कुछ अज्ञात व्यक्तियों ने मोटरसाइकिल को बिना अनुमति ले लिया था, जिससे भारतीय दंड संहिता की धाराएँ 379 और 411 के तहत अपराध निर्मित होता है। आरोपी को 16 सितंबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था और तब से वह न्यायिक हिरासत में था। इस दौरान पूरी विवेचना पूर्ण होकर न्यायालय में चालान प्रस्तुत किया जा चुका था।
जमानत याचिका में आवेदक की ओर से यह दलील दी गई कि आरोपी को झूठा फंसाया गया है, मामले की जांच पूरी हो चुकी है और उसके द्वारा साक्ष्यों से छेड़छाड़ या अदालत से अनुपस्थित रहने की कोई संभावना नहीं है। उसे हिरासत में अधिक समय तक रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता, विशेषकर तब जब मामले के अंतिम निष्पादन में अधिक समय लगने की संभावना है। यह भी कहा गया कि आरोपी जिला गुना का स्थायी निवासी है और अदालत द्वारा लगाए जाने वाली सभी शर्तों का पालन करने को तैयार है।
इसके विपरीत, राज्य की ओर से लोक अभियोजक ने आवेदन का विरोध करते हुए तर्क दिया कि अपराध की प्रकृति को देखते हुए आरोपी को जमानत नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि, अदालत ने समग्र परिस्थितियों को देखते हुए यह पाया कि आरोप ऐसे नहीं हैं जिनके कारण आरोपी को लंबे समय तक प्री-ट्रायल हिरासत में रखा जाए। न्यायालय ने यह भी माना कि विवेचना पूरी हो चुकी है, अतः साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका न्यूनतम है। न्यायालय ने विशेष रूप से यह टिप्पणी की कि अनिश्चितकाल तक चलने वाली न्यायिक हिरासत हमारे संवैधानिक ढांचे में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विरुद्ध है।
अदालत का दृष्टिकोण सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप रहा है, जैसे Hussainara Khatoon बनाम बिहार राज्य (1979), जिसमें शीघ्र सुनवाई के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई; Sanjay Chandra बनाम CBI (2012), जिसमें कहा गया कि जमानत का उद्देश्य सज़ा पूर्व दंड देना नहीं है; तथा Dataram Singh बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2018), जिसमें दोहराया गया कि अभियुक्त के लिए निर्दोषता की presumption न्याय व्यवस्था का मूल तत्व है।
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने आरोपी को ₹50,000 के निजी मुचलके और समान राशि के एक सक्षम जमानतदार पर रिहा करने का निर्देश दिया। इसके अतिरिक्त, आरोपी को छह प्रमुख शर्तों का पालन करना होगा—अदालत और विवेचना में सहयोग करना, गवाहों को प्रभावित न करना, किसी अन्य अपराध में संलिप्त न होना, अनावश्यक स्थगन न मांगना, देश से बाहर न जाना और बॉन्ड की सभी शर्तों का पालन करना। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आरोपी इन शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसकी जमानत स्वतः निरस्त मानी जाएगी।
इस निर्णय से यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि BNSS लागू होने के बाद भी न्यायालयों का दृष्टिकोण अपरिवर्तित है—व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और प्री-ट्रायल हिरासत को दंडात्मक उपाय के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह आदेश भारतीय न्यायपालिका की उस स्थायी प्रतिबद्धता को पुनः रेखांकित करता है जिसमें न्यायालय यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी अभियुक्त को केवल आरोपों के आधार पर अनावश्यक रूप से कारावास में न रखा जाए।


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