ग्वालियर हाई कोर्ट ने सिविल डिक्री के बाद दर्ज एफआईआर को किया रद्द, न्यायिक रिकॉर्ड के विपरीत आरोपों को बताया दुरुपयोग

 

ग्वालियर हाई कोर्ट ने सिविल डिक्री के बाद दर्ज एफआईआर को किया रद्द, न्यायिक रिकॉर्ड के विपरीत आरोपों को बताया दुरुपयोग




लेखक: Advocate Abhishek Jat

17 नवंबर 2025 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ ने Akhilesh Jain & Others बनाम मध्य प्रदेश राज्य (Neutral Citation: 2025:MPHC-GWL:29374, MCRC No. 44825/2023) में एक महत्वपूर्ण निर्णय पारित करते हुए थाना कोतवाली, जिला गुना में दर्ज अपराध क्रमांक 795/2023 की एफआईआर तथा उससे संबंधित संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फडके द्वारा पारित किया गया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विभोर कुमार साहू उपस्थित हुए, जबकि राज्य की ओर से लोक अभियोजक तथा शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने विरोध प्रस्तुत किया।

एफआईआर में दर्ज आरोपों के अनुसार, शिकायतकर्ता ने यह कहा था कि 21 सितंबर 2023 को दोपहर 2 से 3 बजे के बीच याचिकाकर्ता हथियारों के साथ उसकी झोपड़ी में जबरन घुस आए, उसकी माता और पत्नी को बाहर खींचा और झोपड़ी को तोड़ दिया, जिससे पूरा परिवार बेघर हो गया। इन आरोपों के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धाराएँ—452, 323, 294, 506, 354, 427, 147 और 148—के अंतर्गत अपराध दर्ज किया गया था।

हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष यह स्पष्ट तथ्य रखा कि उक्त स्थल पर किया गया किसी भी प्रकार का डिस्पॉज़ेशन (कब्जा हटाना) उनके द्वारा नहीं, बल्कि न्यायालय के नज़रात विभाग द्वारा किया गया था। यह एक लंबी चल रही सिविल कार्यवाही का परिणाम था, जिसमें RCA No. 96/2018 में 26 मार्च 2022 को प्रथम अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, गुना द्वारा कब्जा दिलाने और अतिक्रमण हटाने का डिक्री पारित किया गया था। शिकायतकर्ता द्वारा दायर Order 21 Rule 97 CPC की आपत्तियाँ 28 अगस्त 2023 को निरस्त कर दी गई थीं, और उसी दिन कब्जा warrant जारी हुआ था।

सभी न्यायालयिक रिकॉर्ड—जिसमें पंचनामा, कब्जा रसीद, नज़रात रिपोर्ट शामिल है—स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि 21 सितंबर 2023 को कब्जा अदालत के अधिकारियों द्वारा विधिवत रूप से दिलाया गया था। इस प्रकार, शिकायतकर्ता द्वारा 23 सितंबर 2023 को दर्ज कराई गई एफआईआर न्यायिक रिकॉर्ड के बिल्कुल विपरीत पाई गई।

राज्य एवं शिकायतकर्ता की ओर से प्रस्तुत यह दलील कि एफआईआर में दर्ज आरोपों की सत्यता जांच का विषय है, अदालत ने स्वीकार नहीं की। न्यायालय ने कहा कि जब न्यायिक रिकॉर्ड स्वयं घटना की प्रकृति और क्रियान्वयन को स्पष्ट रूप से दर्शाते हों, तो उनके विपरीत दर्ज एफआईआर को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है।

अदालत ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय State of Haryana v. Bhajan Lal (AIR 1992 SC 604) का उल्लेख किया, जिसमें वे परिस्थितियाँ निर्धारित की गई थीं जहाँ धारा 482 CrPC के तहत FIR को रद्द किया जा सकता है—जैसे कि जब आरोप प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनाते हों, आरोप स्वभाव से असंभव हों, या कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण हो।

न्यायालय ने पाया कि शिकायत एक afterthought थी, जिसका उद्देश्य सिविल डिक्री को अप्रभावी करना था। अदालत ने कहा कि हारने वाला पक्ष आपराधिक प्रक्रिया का सहारा लेकर सिविल आदेश को चुनौती नहीं दे सकता। अतः FIR और उसके आधार पर चल रही सभी आपराधिक कार्यवाहियाँ रद्द कर दी गईं।

इस आदेश से स्पष्ट संदेश मिलता है कि न्यायालय सिविल विवादों को अनावश्यक रूप से आपराधिक मुकदमेबाज़ी में बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना चाहता है। इसके अलावा, यह भी प्रतिपादित किया गया कि न्यायिक रिकॉर्ड को परे रखकर आपराधिक कार्यवाही को जीवित रखना न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के विरुद्ध है।

ग्वालियर हाई कोर्ट का यह निर्णय पुनः सिद्ध करता है कि धारा 482 CrPC के तहत न्यायालय की निहित शक्तियाँ केवल असाधारण परिस्थितियों में प्रयोग की जाती हैं—जहाँ न्यायिक प्रक्रिया स्वयं प्रभावित हो रही हो और इसका उपयोग न्याय सुनिश्चित करने के लिए अपरिहार्य हो।

Disclaimer: This article is intended for informational and academic purposes only. It does not constitute legal advice or create an attorney-client relationship. Readers are encouraged to consult a qualified legal professional for advice regarding specific legal issues or cases. The views expressed herein are those of the author and do not represent the official position of any organization or institution.

Copyright Notice: © 2025 Modi Law Firm. All rights reserved. No part of this article may be reproduced, distributed, or transmitted in any form or by any means, including photocopying, recording, or other electronic or mechanical methods, without the prior written permission of the author. Unauthorized use or reproduction of this material is strictly prohibited and may result in legal action.

Comments