ग्वालियर हाई कोर्ट ने खेत विवाद से उत्पन्न हिंसक झड़प के मामले में आरोपी को दी जमानत, क्रॉस-एफआईआर और सह-आरोपी को मिली राहत को माना महत्वपूर्ण आधार

लेखक: Advocate Abhishek Jat


5 दिसंबर 2025 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ ने Kanha बनाम मध्य प्रदेश राज्य (Neutral Citation: 2025:MPHC-GWL:31681, MCRC No. 55425/2025) में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए गंभीर धाराओं में गिरफ्तार आरोपी को जमानत प्रदान की। यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फडके द्वारा पारित किया गया। इस आवेदन में आरोपी की ओर से अधिवक्ता विभोर कुमार साहू उपस्थित हुए, जबकि राज्य की ओर से लोक अभियोजक समर घुरैया तथा शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता अजय रघुवंशी ने जमानत का विरोध किया।

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, थाना ईसागढ़, जिला अशोकनगर में अपराध क्रमांक 263/2025 पंजीबद्ध किया गया था। अभियोजन के अनुसार, 9 अगस्त 2025 को खेत में मक्का की फसल में बकरियों के घुसने को लेकर पहले विवाद हुआ, जो बाद में दोनों पक्षों के बीच हिंसक झड़प में बदल गया। आरोप है कि फरसा, कुल्हाड़ी, लोहे की रॉड और लाठियों से लैस होकर कई व्यक्तियों ने शिकायतकर्ता पक्ष पर हमला किया, जिससे कई लोगों को रक्तस्रावी चोटें आईं और एक व्यक्ति की जांघ की हड्डी में फ्रैक्चर पाया गया। चिकित्सा परीक्षण और एक्स-रे रिपोर्ट के आधार पर गंभीर धाराएँ जोड़ी गईं।

जमानत याचिका में आवेदक की ओर से यह दलील दी गई कि घटना एकतरफा हमला नहीं बल्कि आपसी फ्री-फाइट का परिणाम थी, जिसकी पुष्टि उसी दिन दर्ज क्रॉस-एफआईआर क्रमांक 264/2025 से होती है, जिसमें शिकायतकर्ता पक्ष के विरुद्ध भी चोट पहुँचाने के आरोप लगाए गए हैं। यह भी तर्क दिया गया कि विवाद अचानक उत्पन्न हुआ और इसका कारण एक साधारण कृषि विवाद था। आवेदक की ओर से यह भी कहा गया कि उसके कब्जे से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ है और सह-आरोपी कृपाल सिंह को इसी न्यायालय द्वारा पहले ही जमानत प्रदान की जा चुकी है, जिससे समानता (parity) का सिद्धांत लागू होता है। इसके अतिरिक्त, यह तर्क रखा गया कि ट्रायल के शीघ्र समाप्त होने की संभावना नहीं है और आवेदक के फरार होने या गवाहों को प्रभावित करने की कोई ठोस आशंका नहीं है।

इसके विपरीत, राज्य की ओर से जमानत का कड़ा विरोध करते हुए आरोपों की गंभीरता और पीड़ितों को आई चोटों पर जोर दिया गया। हालांकि, न्यायालय ने केस डायरी, चिकित्सा साक्ष्य, क्रॉस-केस की मौजूदगी और सह-आरोपी को मिली राहत पर विचार करने के बाद यह पाया कि इस स्तर पर आरोपी को निरंतर हिरासत में रखना आवश्यक नहीं है। न्यायालय ने यह भी ध्यान में रखा कि मुकदमे के निष्पादन में पर्याप्त समय लगने की संभावना है।

अदालत का यह दृष्टिकोण सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित उन सिद्धांतों के अनुरूप है, जिनमें कहा गया है कि जमानत का उद्देश्य अभियुक्त को सज़ा से पूर्व दंडित करना नहीं है और जहाँ घटना आपसी झड़प से उत्पन्न प्रतीत होती हो तथा क्रॉस-एफआईआर मौजूद हो, वहाँ जमानत पर विचार अधिक उदार दृष्टि से किया जा सकता है।

इन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, उच्च न्यायालय ने आरोपी को ₹50,000 के निजी मुचलके एवं समान राशि के एक सक्षम जमानतदार पर रिहा करने का निर्देश दिया। साथ ही, आरोपी पर सामान्य शर्तें लगाई गईं—जैसे विवेचना एवं ट्रायल में सहयोग करना, किसी गवाह को प्रभावित न करना, कोई अन्य अपराध न करना, अनावश्यक स्थगन न माँगना तथा न्यायालय की अनुमति के बिना देश से बाहर न जाना। यह भी स्पष्ट किया गया कि शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में जमानत स्वतः निरस्त मानी जाएगी।

इस आदेश से यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि गंभीर धाराओं के मामलों में भी न्यायालय तथ्यों की समग्रता, घटना की पृष्ठभूमि और निष्पक्षता के सिद्धांत को प्राथमिकता देता है। ग्वालियर हाई कोर्ट का यह निर्णय जमानत न्यायशास्त्र में क्रॉस-एफआईआर, आपसी झड़प और समानता के सिद्धांत के महत्व को एक बार फिर रेखांकित करता है।


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