ग्वालियर हाई कोर्ट ने गंभीर रूप से अस्वस्थ प्रतिवादी के पक्ष में हस्तक्षेप किया, कमीशन पर साक्ष्य दर्ज करने का आदेश दिया
लेखक: Advocate Abhishek Jat
11 दिसंबर 2025 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ ने Shri Dilip Thakur बनाम Dr. Smt. Kanti Sharma (Neutral Citation: 2025:MPHC-GWL:32365, Misc. Petition No. 6519/2025) में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें चिकित्सकीय आधार पर कमीशन द्वारा साक्ष्य दर्ज करने की प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया गया था। यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति हिरदेश द्वारा पारित किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विभोर कुमार साहू उपस्थित हुए।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, प्रत्यर्थी-वादिनी द्वारा आरसीएसए क्रमांक 68/2024 अंतर्गत दीवानी वाद प्रस्तुत किया गया था। जब वाद प्रतिवादी के साक्ष्य के चरण में पहुँचा, तब प्रतिवादी-याचिकाकर्ता ने 18.09.2025 को सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XXVI नियम 4 के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत किया। आवेदन में यह कहा गया कि याचिकाकर्ता एक गंभीर रूप से पक्षाघात (लकवा) से पीड़ित व्यक्ति है, जो बिना सहायता के चलने-फिरने में असमर्थ है तथा स्पष्ट रूप से बोल भी नहीं पाता। याचिकाकर्ता वर्तमान में भोपाल में अपने पुत्र के साथ रहकर नियमित चिकित्सकीय उपचार एवं फिजियोथेरेपी करवा रहा है और शारीरिक रूप से गुना स्थित न्यायालय में उपस्थित होने में असमर्थ है। उसने यह भी स्वेच्छा से स्वीकार किया कि कमीशन की समस्त लागत एवं पारिश्रमिक वह स्वयं वहन करेगा।
वादिनी की ओर से इस आवेदन का विरोध करते हुए यह तर्क दिया गया कि प्रस्तुत किए गए चिकित्सकीय दस्तावेज पुराने हैं। ट्रायल कोर्ट ने 26.09.2025 को केवल इस आधार पर आवेदन निरस्त कर दिया कि हाल का मेडिकल प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया है। इस आदेश से आहत होकर याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 227 के अंतर्गत उच्च न्यायालय का रुख किया।
उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क रखा गया कि ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण अत्यधिक तकनीकी और न्याय के उद्देश्य के विपरीत है। यह कहा गया कि याचिकाकर्ता की चिकित्सकीय स्थिति विवादित नहीं है और उपलब्ध रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि वह गंभीर शारीरिक अक्षमता से ग्रस्त है। केवल नवीन मेडिकल प्रमाण-पत्र के अभाव में आवेदन खारिज करना न्यायसंगत नहीं है, विशेषकर तब जब आदेश XXVI नियम 4 का उद्देश्य ही यह है कि बीमारी या दुर्बलता के कारण न्यायालय में उपस्थित न हो सकने वाले व्यक्ति को साक्ष्य प्रस्तुत करने के अधिकार से वंचित न किया जाए। इस संदर्भ में Ameer Trading Corporation Ltd. बनाम Shapoorji Data Processing Ltd., (2004) 1 SCC 702 के निर्णय पर भरोसा किया गया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा है कि प्रक्रिया संबंधी नियम न्याय के उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए होते हैं, न कि उसे बाधित करने के लिए।
माननीय उच्च न्यायालय ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद यह पाया कि याचिकाकर्ता की चिकित्सकीय स्थिति वास्तविक और गंभीर है तथा ट्रायल कोर्ट ने केवल तकनीकी आधार पर आवेदन अस्वीकार कर दिया, बिना यह परखे कि उपलब्ध चिकित्सकीय अभिलेख उसकी असमर्थता को प्रमाणित करते हैं या नहीं। न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि किसी गंभीर रूप से अस्वस्थ और शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति को केवल साक्ष्य दर्ज कराने के लिए यात्रा करने को बाध्य करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के भी विपरीत है।
इन परिस्थितियों में उच्च न्यायालय ने यह माना कि ट्रायल कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र का उचित और न्यायोचित प्रयोग नहीं किया, जिससे न्याय का हनन हुआ। परिणामस्वरूप, उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए आदेश XXVI नियम 4 सीपीसी के अंतर्गत प्रस्तुत आवेदन को स्वीकार कर लिया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता-प्रतिवादी का साक्ष्य भोपाल में सक्षम कोर्ट कमिश्नर के माध्यम से विधि अनुसार दर्ज किया जाए। यह भी निर्देश दिया गया कि कमीशन की संपूर्ण लागत याचिकाकर्ता द्वारा वहन की जाएगी और उसके पश्चात ट्रायल कोर्ट वाद का शीघ्र निपटारा करेगा।
यह निर्णय इस सिद्धांत को पुनः रेखांकित करता है कि दीवानी प्रक्रिया में तकनीकी औपचारिकताओं को मानवोचित दृष्टिकोण और न्याय के मूल उद्देश्य पर हावी नहीं होने दिया जा सकता। ग्वालियर हाई कोर्ट का यह आदेश न्यायिक संवेदनशीलता, निष्पक्ष प्रक्रिया और प्रक्रियात्मक कानून के न्यायोचित प्रयोग का एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है।
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