ग्वालियर हाई कोर्ट ने आबकारी अधिनियम के मामले में आरोपी को दी जमानत, लंबी प्री-ट्रायल हिरासत को स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया

 

ग्वालियर हाई कोर्ट ने आबकारी अधिनियम के मामले में आरोपी को दी जमानत, लंबी प्री-ट्रायल हिरासत को स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया

लेखक: Advocate Abhishek Jat

16 दिसंबर 2025 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ ने Raj Pardi बनाम मध्य प्रदेश राज्य (Neutral Citation: 2025:MPHC-GWL:33074, MCRC No. 55152/2025) में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए आबकारी अधिनियम के तहत गिरफ्तार आरोपी को जमानत प्रदान की। यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फडके द्वारा पारित किया गया। इस आवेदन में आरोपी की ओर से अधिवक्ता विक्रम सिंह उपस्थित हुए, जबकि राज्य की ओर से पैनल लॉयर सुश्री कल्पना परमार ने जमानत का विरोध किया।

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, थाना कचनार, जिला अशोकनगर में अपराध क्रमांक 245/2025 पंजीबद्ध किया गया था, जिसमें यह आरोप लगाया गया कि आरोपी के कब्जे से लगभग 60 लीटर देशी मदिरा बरामद की गई। इस आधार पर आरोपी के विरुद्ध मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत अपराध दर्ज किया गया। आरोपी को 19 नवंबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था और तब से वह न्यायिक हिरासत में था। इस दौरान विवेचना प्रचलित थी और प्रकरण न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा विचारणीय था।

जमानत याचिका में आवेदक की ओर से यह दलील दी गई कि आरोपी को झूठा फँसाया गया है और उसका कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं है। यह भी कहा गया कि आरोपी जिला अशोकनगर का स्थायी निवासी है, जिससे उसके फरार होने की संभावना नहीं है। इसके अतिरिक्त, यह तर्क रखा गया कि इस प्रकार के मामलों में परीक्षण की प्रक्रिया सामान्यतः लंबी होती है और जब तक मामला अंतिम रूप से तय न हो जाए, तब तक आरोपी को निरंतर हिरासत में रखना न्यायसंगत नहीं है। आवेदक ने यह भी आश्वासन दिया कि वह न्यायालय द्वारा लगाए जाने वाली सभी शर्तों का पालन करेगा।

इसके विपरीत, राज्य की ओर से जमानत आवेदन का विरोध करते हुए कहा गया कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और आरोपी को राहत नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि, न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों और केस डायरी का अवलोकन करने के बाद यह पाया कि आरोप ऐसे नहीं हैं जिनके कारण आरोपी को अनिश्चितकाल तक प्री-ट्रायल हिरासत में रखा जाए। न्यायालय ने विशेष रूप से यह माना कि परीक्षण के शीघ्र समाप्त होने की संभावना नहीं है और ऐसी स्थिति में लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रखना व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों के विपरीत होगा।

अदालत का यह दृष्टिकोण सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुरूप है, जैसे Sanjay Chandra बनाम CBI (2012), जिसमें कहा गया कि जमानत का उद्देश्य सज़ा से पूर्व दंड देना नहीं है, तथा Dataram Singh बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2018), जिसमें यह दोहराया गया कि अभियुक्त को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक उसका दोष सिद्ध न हो जाए। इन निर्णयों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि “bail is the rule and jail is the exception।”

इन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, उच्च न्यायालय ने आरोपी को ₹50,000 के निजी मुचलके एवं समान राशि के एक सक्षम जमानतदार पर रिहा करने का निर्देश दिया। साथ ही, न्यायालय ने आरोपी पर सामान्य शर्तें लगाईं—जैसे विवेचना एवं परीक्षण में सहयोग करना, गवाहों को प्रभावित न करना, कोई अन्य अपराध न करना, अनावश्यक स्थगन न माँगना तथा न्यायालय की अनुमति के बिना देश से बाहर न जाना। यह भी स्पष्ट किया गया कि शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में जमानत स्वतः निरस्त मानी जाएगी।

इस आदेश से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के लागू होने के बाद भी न्यायालयों का मूल दृष्टिकोण अपरिवर्तित है—व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और प्री-ट्रायल हिरासत को दंडात्मक उपाय के रूप में नहीं अपनाया जा सकता। ग्वालियर हाई कोर्ट का यह निर्णय एक बार फिर इस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से कारावास में रखना न्याय के मूल उद्देश्य के विपरीत है।

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