ग्वालियर हाई कोर्ट ने सेवानिवृत्त कर्मचारी की लंबित अभ्यावेदन पर 90 दिन में निर्णय का दिया निर्देश

 

लेखक: Advocate Abhishek Jat


6 नवंबर 2025 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ ने Mr. Devi Singh Bhadoriya बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य (Neutral Citation: 2025:MPHC-GWL:28183, WP No. 41394/2025) में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता की लंबित अभ्यावेदन पर नियत समय-सीमा के भीतर निर्णय करे। यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति आशीष श्रोती द्वारा पारित किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विभोर कुमार साहू उपस्थित हुए, जबकि राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता ने पक्ष रखा।

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, याचिकाकर्ता एक शासकीय सेवक रहे हैं, जो वर्ष 2016 में सेवानिवृत्त हुए। याचिका में यह कहा गया कि सेवानिवृत्ति के समय उनके विरुद्ध एक विभागीय जांच लंबित थी, जिसका अंतिम निष्कर्ष वर्ष 2023 में आया और जिसमें याचिकाकर्ता को दोषमुक्त कर दिया गया। इसके बावजूद, उनके सेवा अभिलेख में वर्ष 2013-14 से संबंधित प्रतिकूल प्रविष्टियाँ बनी रहीं, जिसके कारण उन्हें पदोन्नति, पेंशन, ग्रेच्युटी तथा अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित किया गया।

याचिकाकर्ता ने इन विसंगतियों को सुधारने के लिए दिनांक 18 दिसंबर 2024 को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत किया, किंतु उस पर अब तक कोई निर्णय नहीं लिया गया। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और सेवा रिकॉर्ड में सुधार, लंबित लाभों के भुगतान तथा प्रतिकूल प्रविष्टियों को हटाने की मांग की।

सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने प्रारंभ में ही यह स्पष्ट किया कि वे इस चरण पर सभी राहतों पर जोर न देते हुए केवल इतना चाहते हैं कि याचिकाकर्ता की लंबित अभ्यावेदन पर विधि अनुसार निर्णय लिया जाए। दूसरी ओर, राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि याचिका में विलंब एवं शिथिलता (delay and laches) है।

दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के पश्चात, न्यायालय ने यह पाया कि अभ्यावेदन अब भी सक्षम प्राधिकारी के समक्ष लंबित है और जब तक उस पर निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक विवाद का प्रभावी समाधान संभव नहीं है। न्यायालय ने इस तथ्य पर बल दिया कि प्रशासनिक प्राधिकारियों का दायित्व है कि वे सेवानिवृत्त कर्मचारियों के अभ्यावेदनों का समयबद्ध निपटारा करें, विशेषकर तब जब विभागीय जांच में कर्मचारी को दोषमुक्त किया जा चुका हो।

अतः उच्च न्यायालय ने याचिका का अंतिम निराकरण करते हुए प्रतिवादी क्रमांक-1 को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता की अभ्यावेदन पर 90 दिनों की अवधि के भीतर उपयुक्त आदेश पारित करे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि निर्णय लेते समय राज्य की ओर से उठाए गए आपत्तियों पर भी विचार किया जा सकता है। न्यायालय ने यह भी साफ किया कि उसने मामले के गुण-दोष (merits) पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।

यह आदेश प्रशासनिक कानून के उस स्थापित सिद्धांत को दोहराता है कि किसी कर्मचारी की सेवा से संबंधित शिकायतों और अभ्यावेदनों को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता। ग्वालियर हाई कोर्ट का यह निर्णय सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है कि यदि उनका अभ्यावेदन वर्षों तक लंबित रहता है, तो वे न्यायालय से केवल निर्णय कराने की सीमा तक भी राहत प्राप्त कर सकते हैं, बिना इस चरण पर अंतिम अधिकारों का निर्धारण कराए।

यह फैसला न केवल सेवा कानून में mandamus के सीमित लेकिन प्रभावी उपयोग को दर्शाता है, बल्कि यह भी रेखांकित करता है कि न्यायालय प्रशासनिक निष्क्रियता को मौन स्वीकृति नहीं देता।

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